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उत्तर प्रदेश अखिलेश सरकार का अभिनन्दन

“निलम्बित करना शिक्षा नहीं। सरकार किसी भी सरकारी कर्मचारी को बिना कोई कारण बताये निलम्बित कर सकती है। निलम्बन के खिलाफ सिर्फ और सिर्फ सरकार को अर्जी कि जा सकती है। इसमें कोई न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता। सरकार अपनी सुविधा के अनुसार इस मामले का परिशोधन करने के बाद निलम्बन रद्द कर सकती है अथवा निलम्बित सरकारी कर्मचारीके अनुरोध पर पुनर्विचार करने के बाद निलम्बन रद्द कर सकती है।”

केंद्र सरकार और राज्य सरकारोमे काम करनेवाले सभी सरकारी नौकरो को अपने लिखित सेवाशर्तोंमें उपर्लिखित प्रावधान पता होता है। सभी स्तरोंपर तथा खासकर सचिवीय पदपर काम करनेवाले आईएस अधिकारी अपने तहत काम करनेवाले किसी सरकारी अधिकारी अथवा कर्मचारी को सनकीपनसे निलम्बित करते है, तब उसके सिर्फ पूछे जानेपर उपर्लिखित नियम का प्रावधान सुनाया जाता है।

मगर खेदजनक बात ये है कि यही आईएस अधिकारी और उनके संगठन उत्तर प्रदेश के एक कनिष्ठ अधिकारी दुर्गा शक्ति को सरकारने निलम्बित करने के बाद बादल फटने जैसा बेशरम विलाप कर रहे है। निलम्बन के खिलाफ मिडिया अथवा कही और निवेदन देना सेवाशर्त का उल्लंघन माना जाता है। ऐसा होनेपरभी देशभरके सभी भाषिक चैनल्स और अखबारोंने यह विषय हड्डी जैसा चूसकर अपनी अपरिपक्वता का गन्दा और शर्मनाक प्रदर्शन किया है।

लोकतंत्रमें जनप्रतिनिधि, विधायक एवं सांसद ही पूरी तरहसे लोकतंत्रके रक्षक और सहारा है। इन जनप्रतिनिधियोंकी शासक और विपक्ष ऐसा विभाजन हो सकता है। तथा विभिन्न तत्वप्रणालियोंके अनुसार राजनीतिक दल अनुसार हो सकती है। सभी जनप्रतिनिधियोंने जनतंत्रके मूल्योंका आदर करना अपेक्षित होता है।लोकसभा, राज्यसभा तथा राज्योंकी विधानसभामे काफी विवाद होते है। इस स्थितिमें पीठासीन अधिकारी प्रसंगानुरूप तथा शासन संकेतोके अनुसार सदस्योंको निलम्बित करते है।

निलम्बन किसीकाभी हो, अत्यंत दुःखद होता है। इसके बावजूद अक्सर जनप्रतिनिधिही अपने निलम्बित भाईका पक्ष बिना सुने, बिना लिए अघोरी आनंद मनाते है। यह लोकतंत्रके लिए घिनौनी बात है। महाराष्ट्रने इस बातका अनुभव हर अधिवेशनमें लिया है। इस पृष्ठभूमिपर उत्तर प्रदेश सरकारने निलम्बित किये एक सामान्य आईएस अधिकारीके लिए पुरे देशके लगभग सभी राजनीतिक दल और उनके विधायक-सांसद-मंत्री अपने बीच के राजनितिक मतभेद भूलकर उत्तर प्रदेश सरकारके खिलाफ नारे लगाते है, यह लोकतंत्रके लिए चिंतनीय तथा चिंताजनक बात है। अत्यंत आपत्तिजनक बर्ताव है। हम फ़िलहाल जरुर टोकरी में हो, मगर चक्कीमे जरुर पिसे जायेंगे। इस बात कि ओर आँखे मूंदकर अनदेखी करना आत्मघातकी और अव्यवहार्य है।

उत्तर प्रदेश कि आईएस अधिकारी दुर्गा शक्तिका वर्तन सही या गलत यह बात न्यून है। उत्तर प्रदेश सरकारने उसे निलम्बित किया यह बात सत्य, अधिकारपूर्ण तथा वैध है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय शिवश्री अखिलेश यादव इन्होने अपनी कार्रवाई का स्पष्टीकरण देकर उसका समर्थन भी किया था।  उस समय पुरे भारत के पंचायत सदस्यसे लेकर सांसद तक सभीने एकमत होकर, अपने सभी मतभेद भूलकर उत्तर प्रदेश सरकारका अभिनन्दन करना चाहिए था। तब जाकर अरुण भाटिया, वाय.पी. सिंग, किरण बेदी, अरविन्द केजरीवाल जैसे ढीठ लॉबीपर अंकुश रखना मंत्रियोंको आसान जाता। विधायक-सांसद-मंत्रियोंने ताकत दिखानेके लिए “सचिवालय” नाम बदलकर “मंत्रालय” किया है। माननीय अटलजीने जिनका “दुर्गा” कहकर गौरव किया था, उन भारतकी दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इन्होनेही “संसद, न्यायपालिका और कार्यकारी मंडलसे जादा सर्वसत्ताधीश, सर्वश्रेष्ठ तथा सुप्रीम होती है” यह दिखा दिया था।

हमारे विधायक-सांसद आईएस-आईपीएस-नौकरशाहके हाथके खिलोने बन गए है। यह बात लोकतंत्रके गलेपर लगे फाँसीकी गांठ कसने जैसी है, ऐसा मेरा मानना है। पूरा देश और मिडिया खिलाफ होनेके बावजूद मा. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी भूमिका पर टिके रहे, इसपर उनका और उत्तर प्रदेश सरकारका अभिनन्दन। इस बातका समर्थन करनेके लिए उन्होंने “हमें आईएस अधिकारी नहीं चाहिए” इतनी स्पष्ट भूमिका रखी। यह बात बहुत प्रेरणादायक है और इससे महाराष्ट्रने कुछ सीखना चाहिए।

हमारा साधारण अनुभव यही है कि डायरेक्ट आईएस-आईपीएस बनकर आये हुए अनेक अधिकारी एक-दो महीने अपने अपने क्षेत्रमें भारी ड्रामेबाजी और पेपरबाजी करते है। कम से कम आज पूरा भारत विभिन्न क्षेत्रके नौकरशाहोंके कब्जेमें है। सुईकी नोंक जितनी कोई अच्छी बात होनेपर उसका श्रेय लेनेके लिए वे आगे होते है। आज भारतमे जो अत्याचार, भ्रष्टाचार, अन्याय, गरीबी, पिछड़ापन, महंगाई, असमानता, धार्मिकता, जातिवाद, शोषण, आतंकवाद, दहशतंगेज़ी, नक्सलवाद, हिंसा बढ़ गयी है उसके लिए यही नौकरशाह जिम्मेदार है।

वीर भगतसिंग फांसीपर जानेसे पहले अचानक चिंतित और भावुक हो गए थे। उस वक्त वहाँ मौजूद सिपाहिको उन्होंने कहा था, “मेरे भारतसे यह गोरे अंग्रेज जरुर चले जायेंगे, इसपर मेरा विश्वास है। लेकिन इन गोरे अंग्रेजोंके जगह बैठनेवाले भारतीय काले अधिकारी अंग्रेजोंसे जादा हानिकारक और अत्याचारी होंगे या बनेंगे। इसकी वजहसे पीड़ित मेरा भारतीय समाज कहेगा कि इससे तो अंग्रेजोका राज्य अच्छा था! अगर ऐसा नहीं होगा तो मेरे जैसे लाख भगतसिंग भारतीयोंकी खुशीके लिए हसते हसते फांसी चढ़ जायेंगे। यह सोचते हुए मैं भावुक हो गया और मेरी आँखे भर आई। मेरे दोस्त गलत मत समझना।”

जनप्रतिनिधियोंने भगतसिंगकी भावनाओंको जरुर न समझा हो मगर न्यायपालिकाने अपनी न्यायी जिम्मेदारी समझकर प्रजा भावनाकी रक्षा कि इसी बात का आनंद है।

– पुरुषोत्तम खेडेकर
संस्थापक अध्यक्ष, मराठा सेवा संघ

अनुवाद- विनीत

मूल मराठी लेख यहाँ पढ़े: उत्तर प्रदेश अखिलेश सरकारचे अभिनंदन

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